दिशा गैसलाइटिंग क्या होती है?
हाय दिशा, स्कूल में और ऑनलाइन हर कोई “गैसलाइटिंग” शब्द इस्तेमाल कर रहा है। मुझे पता है कि ये कुछ बुरा होता है, लेकिन मुझे ठीक से समझ नहीं आता कि इसका मतलब क्या है। क्या तुम समझा सकती हो? तान्या,14.

हेय्य! बहुत सही सवाल है। सच बोलूँ तो तुम अकेले नहीं हो जो इस बात को लेकर कन्फ्यूज़ हो। “गैसलाइटिंग” उन शब्दों में से है जो आजकल हर जगह दिखते हैं — रील्स में, रेंट्स में, कमेंट सेक्शन में, स्कूल की रैंडम बातों में। सब इसे बड़े कॉन्फिडेंस से बोलते हैं… लेकिन जैसे ही तुम पूछो, “अच्छा, पर इसका असली मतलब क्या है?” अचानक सब इधर उधर देखने लगते है।
तो चलो, इसे ढंग से समझते हैं।
गैसलाइटिंग का असली मतलब
गैसलाइटिंग तब होती है जब कोई तुम्हें तुम्हारी अपनी सोच, तुम्हारी अपनी फीलिंग्स या तुम्हारी अपनी याददाश्त पर शक कराने लगे।
और नहीं, इसमें कोई बड़ा ड्रामा नहीं होता।कोई ज़ोरदार झगड़ा नहीं। कोई बैकग्राउंड म्यूज़िक नहीं। कोई ऐसा पल नहीं जब तुम खिड़की से बाहर देखते हुए अचानक सच्चाई समझ जाओ।
ये धीरे-धीरे होता है।
तुम्हें किसी बात से तुम्हें बुरा लगा। फिर पाँच मिनट बाद तुम सोचने लगते हो, “रुको… क्या मैं ज़्यादा सोच रहा/रही हूँ?” जबकि असल में कुछ बदला ही नहीं होता।तुमने कुछ गलत नहीं सोचा। बस तुम्हारे दिमाग को कन्फ्यूज़ किया जा रहा है।
मान लो तुम अपने दोस्त से कहते हो, “जब तुमने पूरे दिन मुझे इग्नोर किया, मुझे सच में बुरा लगा।”
वो जवाब देता है, “क्या बात कर रहे हो? मैंने तुम्हें इग्नोर ही नहीं किया।”
अब तुम अपने दिमाग में व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, अपनी यादें सब चेक करने लगते हो। सच में इग्नोर नहीं किया था? मैंने ही ज़्यादा सोच लिया? उसने देर से रिप्लाई किया था या मैंने जल्दी-जल्दी चेक किया?
अगर ये एक बार हो तो ठीक है। अगर ये बार-बार होने लगे तो समझो ओवरथिंकिंग का सीज़न शुरू।
गैसलाइटिंग कंट्रोल के बारे में है
ये सिर्फ झूठ बोलना या अलग तरह से याद होने की बात नहीं है। ये हर हाल में सही साबित होने की ज़रूरत के बारे में है।
एक इंसान “सच” का बॉस बन जाता है। दूसरा इंसान स्क्रीनशॉट इकट्ठा करने लगता है, अपनी बात बार-बार समझाता है, और नहाते समय भी उस बातचीत की प्रैक्टिस करता है जो शायद कभी हो ही न।
ये बातचीत नहीं है। ये इमोशनल खेल है और तुमने तो खेलने के लिए हाँ भी नहीं किया था।
ये सिर्फ रोमांटिक रिश्तों में नहीं होता
ये दोस्ती में भी हो सकता है। जैसे कोई कुछ बुरा बोल दे और बाद में कहे, “मैं तो मज़ाक कर रहा था, तुम इतना सीरियस क्यों हो?”
ये फ्रेंड ग्रुप में भी हो सकता है, जहाँ तुम्हारे रिएक्शन को बड़ा बना दिया जाता है, पर जिस बात से तुम्हें बुरा लगा, उसे छोटा कर दिया जाता है।
ये घर में भी हो सकता है, जब तुम कहो कि तुम्हें बुरा लगा और जवाब मिले, “तुम बेकार का ड्रामा कर रहे हो।”
सीधी बात, अगर बात “तुम ऐसे रिएक्ट क्यों कर रहे हो?” से शुरू होती है, “मैंने ऐसा क्यों किया?” से नहीं, तो थोड़ा ध्यान दो।
कुछ लाइनें जो तुम्हें पहचान में आ सकती हैं
“तुम ज़्यादा रिएक्ट कर रहे हो।”
“ऐसा कभी हुआ ही नहीं।”
“तुम बहुत सेंसिटिव हो।”
“हर बात को इतना बड़ा मुद्दा क्यों बनाते हो?”
कभी-कभी ऐसा सुनना नॉर्मल है। लेकिन हर बार जब तुम अपनी बात रखो और यही सुनो, तो ये नॉर्मल नहीं है।
गैसलाइटिंग तुम्हें कैसा महसूस कराती है?
तुम कन्फ्यूज़ महसूस करते हो। थोड़ा अजीब। थोड़ा गिल्टी। कभी-कभी तुम माफ़ी भी मांग लेते हो, जबकि तुम्हें खुद नहीं पता होता कि किस बात की।
तुम बातें उठाना बंद कर देते हो, क्योंकि हर बार खुद को समझाना बहुत बड़ा काम लगने लगता है।
धीरे-धीरे चुप रहना आसान लगने लगता है, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए।
अगर तुम्हें लगता है कि चुप रहना, बोलने से ज़्यादा सुरक्षित है, तो कुछ ठीक नहीं है।
गैसलाइटिंग और नॉर्मल बहस में फर्क
मतभेद होना गलत नहीं है। अलग राय होना भी गलत नहीं है।
एक हेल्दी बहस में कोई कह सकता है, “मैं इसे ऐसे नहीं देखता, लेकिन समझ सकता हूँ कि तुम्हें बुरा क्यों लगा।”
गैसलाइटिंग में जवाब होगा, “तुम हमेशा ऐसे ही क्यों सोचते हो?”
एक जवाब सुनता है। दूसरा तुम्हें चुप कर देता है।
अगर कोई बार-बार तुम्हें तुम्हारी यादों, तुम्हारी रिएक्शन या तुम्हारी फीलिंग्स पर शक करवाता है, तो रुककर ध्यान दो।
तुम “बहुत ज़्यादा नहीं सोच रहे हो। तुम बस किसी असली चीज़ पर रिएक्ट कर रहे हो।
तुम ऐसे रिश्तों के हक़दार हो जहाँ तुम्हें सीरियसली लिए जाने के लिए स्क्रीनशॉट, गवाह या पूरा प्रेज़ेंटेशन देने की ज़रूरत न पड़े।
हमेशा।
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