सारा दिन पढ़ाई करके भी लग रहा है जैसे कुछ नहीं किया!
क्या आपके साथ भी ऐसा हुआ है कि पूरा दिन किताबों में घुसे रहे, फिर भी मन में यही चल रहा है कि “भाई, अगली बार पक्का पढ़ूँगा”? प्रिशा का भी यही हाल था। वो अपना टाइमटेबल देख कर बस रोने ही वाली थी, जब एक फोन कॉल ने उसे उसकी असली प्रॉब्लम समझा दी। ‘फीलिंग्स एक्सप्रेस’ का ये एडिशन पढ़ो और जानो कि उसने इस ‘प्रोडक्टिविटी स्ट्रेस’ से कैसे डील किया।

वो वाली फीलिंग पता है? सुबह 9 बजे से “पढ़ने” बैठे हो, पीठ में दर्द हो रहा है, पानी की बोतल बार-बार खाली हो रही है, हाईलाइटर्स घिस-घिस के दम तोड़ रहे हैं… और फिर भी रात के 9 बजे ऐसा लगता है कि भाई, आज तो कुछ किया ही नहीं?
बाहर से देखोगे तो लगेगा मैं कितनी पढ़ाकू हूँ। डेस्क पर बैठी हूँ, स्टिकी नोट्स लगे हैं, टाइमटेबल तो ऐसा बनाया है जैसे सीधा पिनटेरेस्ट से आया हो। अगर ‘प्रोडक्टिविटी’ का कोई फोटोशूट होता, तो मैं पक्का शॉर्टलिस्ट हो जाती।
पर अंदर से? अंदर तो बस “कृपया प्रतीक्षा करें…” चल रहा है। एक पेज पढ़ती हूँ और दिमाग में आता है, “अगर यही लाइन 5 नंबर के लिए आ गई और मैं भूल गई तो?” मैथ के पांच सवाल सॉल्व करती हूँ, पर खुश होने के बजाय उन दो सवालों पर अटक जाती हूँ जो गलत हुए। 15 मिनट का ब्रेक लेती हूँ तो दिमाग ताने मारने लगता है, “वाह! ऐसे आएँगे मार्क्स?” ऐसा नहीं है कि मैं पढ़ नहीं रही। मैं पढ़ रही हूँ। पर साथ में उससे भी ज़्यादा सोच भी रही हूँ।
उस दिन मैंने तीन घंटे बायोलॉजी पढ़ी। पूरे तीन घंटे! और बाद में मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि कुछ दिमाग में गया भी है या मैं बस दीवार को घूर रही थी। मुझे गिल्ट हो रहा था, फ्रस्ट्रेशन हो रही थी और ऐसा लग रहा था जैसे मेरे खुद के दिमाग ने मुझे धोखा दे दिया है।
तो मैंने अपनी फ्रेंड रिया को कॉल किया।
मेरा कोई सीरियस बात करने का इरादा नहीं था। मुझे बस अपने दिमाग की उस आवाज़ से ब्रेक चाहिए था जो चिल्ला रही थी, “बोर्ड्स, बोर्ड्स, बोर्ड्स!” पर तीन मिनट के अंदर ही मेरे मुँह से निकल गया, “भाई, तुझे भी कभी ऐसा लगता है क्या कि पूरा दिन पढ़ कर भी कुछ नहीं किया?”
उसने एक सेकंड भी नहीं सोचा। “ब्रो, रोज़ का है ये तो!” और कसम से, उस एक “ब्रो” ने मेरा आधा स्ट्रेस खत्म कर दिया।
उसने बताया कि उसका आधा टाइम तो चैप्टर पर फोकस करने के बजाय एग्ज़ाम हॉल इमेजिन करने में निकल जाता है। मैंने भी माना कि मैं अपनी ‘प्रोडक्टिविटी’ इस बात से नापती हूँ कि मैं कितनी देर बैठी, न कि इस बात से कि मुझे कितना समझ आया। अगर मैं 8 घंटे बैठी हूँ, तो मुझे लगना चाहिए कि मैंने आज बहुत पढाई की है। और जब वो वाली फीलिंग नहीं आती, तो मुझे लगता है कि मुझमें ही कोई खराबी है!
फिर उसने कहा, “चल, बुक बंद कर। बता तुझे क्या-क्या याद है।” मैं घबरा गई, “मुझे कुछ याद नहीं है!” उसने कहा, “बस कोशिश तो कर।”
और जब मैंने बोलना शुरू किया, तो मुझे चीज़ें याद आने लगीं। एकदम किताबी डेफिनेशन तो नहीं, पर चीज़ों का मतलब, उनके एक्ज़ाम्पल और होने या ना होने होने की वजाह… सब याद था। चीज़ें दिमाग में गई थीं, बस स्ट्रेस के नीचे छुपी हुई थीं।
तब मुझे समझ आया कि मैं शांति से नहीं पढ़ रही, मैं ‘स्ट्रेस–स्टडी‘ कर रही हूँ। मैं बार-बार एक ही चीज़ इसलिए पढ़ती हूँ क्योंकि मुझे खुद पर भरोसा नहीं है। मैं आगे इसलिए नहीं बढ़ती क्योंकि “कहीं पिछला वाला भूल न जाऊँ?” मैं छोटी-छोटी चीज़ों पर खुश ही नहीं होती क्योंकि वो कुछ ख़ास नहीं लगतीं।
हमने कुछ बेसिक चीज़ें ट्राई करने का सोचा। छोटे-छोटे समय के लिए पढ़ना। बिना किसी गिल्ट के असली वाला ब्रेक लेना। और हर सेशन के बाद, टॉपिक को बोल कर समझाना जैसे हम किसी और को पढ़ा रहे हों।
अगले दिन मैंने ये ट्राई भी किया।
क्या मैं रातों-रात टॉपर बन गई? बिलकुल नहीं। क्या मैं फोन बार बार फ़ोन पर ध्यान गया? बिलकुल! पर रात में, ये सोचने के बजाय कि “आज कुछ नहीं किया,” मैंने वो तीन चीज़ें लिखीं जो मैंने सच में की थीं:
- केमिस्ट्री का एक चैप्टर खत्म किया।
- मैथ के 12 सवाल किए (भले ही 4 गलत थे)।
- फिजिक्स का वो एक कॉन्सेप्ट समझा जो ‘शायद आइंस्टीन भी नहीं समझ पाते‘।
उसे लिखा हुआ देख कर अलग ही फील आई। कोई फिल्मी या ड्रामैटिक नहीं, बस… ‘रियल’।
मुझे लगता है एग्ज़ाम वाला ‘बर्नआउट’ बड़ा अजीब होता है। ये हमेशा किताबों पर रोने जैसा नहीं दिखता। कभी-कभी ये बस सारा दिन डेस्क पर बैठना और अपनी ही लाइफ में एक साइड रोल होने जैसा महसूस करना है। आप वहाँ हो, पर आपको यकीन नहीं हो रहा कि आप आगे बढ़ रहे हो।
रिया से बात करने से मेरी ज़िंदगी रातों-रात सॉर्ट नहीं हो गई। अभी भी ऐसे दिन आते हैं जब मैं पैनिक करती हूँ। मैं अभी भी खुद को उस दोस्त से कंपेयर करती हूँ जो कहता है कि उसका चौथा रिविज़न चल रहा है (सच बताऊँ तो, मुझे उस पर रत्ती भर भरोसा नहीं है)।
पर अब, जब मेरा दिमाग कहता है, “आज तूने कुछ नहीं किया,” तो मैं रुकती हूँ।
क्या मैंने सच में कुछ नहीं किया?
या मैंने बस खुद को क्रेडिट नहीं दिया?
कभी-कभी जवाब होता है कि मुझे और फोकस करना है। और कभी-कभी जवाब होता है कि मैं बस थकी हुई हूँ, डरी हुई हूँ और खुद पर ज़रूरत से ज़्यादा प्रेशर डाल रही हूँ।
जो भी हो, मैं धीरे-धीरे ये सीख रही हूँ कि मेहनत हमेशा ‘एपिक’ नहीं लगती। कभी-कभी ये बहुत खिचड़ी होती है, कभी-कभी एकदम ऐंवई लगती है। पर फिर भी, ये मानी जाती है।
तो अगर तुम भी अभी डेस्क पर बैठ कर ऐसा ही फील कर रहे हो, तो जान लो कि तुम अकेले नहीं हो। हम सब यहीं हैं, कोशिश कर रहे हैं। थोड़े से थके हुए, थोड़े से डरे हुए, थोड़े से नौटंकी, पर फिर भी… लगे हुए हैं।
और सच तो ये है कि भाई, ये भी अपने आप में बड़ी बात है!
